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लाइट पहले क्यूँ नही गयी

घर पर होते तो हर वक्त रहता तमाशा
निशी के माँ पापा की बनती ही नही थी
इसलिए दोनो को घर से ज्यादा
अपने अपने आॅफिस की दीवारे पसंद थी
घर पर निशी के पास दादी का साथ था
बाकी वक्त दादी भी मंदिर मे बैठी रहती

रात के नौ बजे बाकी दिन
सब अपने कमरे मे होते थे
पर आज माहौल अलग था
निशी के माँ पापा और दादी ने
छत पर डेरा डाला था

“बदन पर सितारे लपेटे हुए” गाना
अब निशी को पसंद नही रहा
निशी को स्वीमिंग ही नही
ड्राॅईंग भी पसंद था
और उसे 3rd क्लास मे
3rd प्राईज भी मिला था
माँ को इन सब बातो का
आज पता चला था

पापा ने भी जाना आज
घर घर खेलने वाली निशी
13 साल की हो गयी
लेकिन कभी उसने बर्थडे पर
कोई तोहफा मांगा ही नही
पर फिर ऊंगली खुद पर उठायी
कि आखिर क्यूँ मैने भी पूछा नही

उसके हाथो मे जो टेड्डी बियर था
पापा को वो कुछ कुछ निशी सा ही लगा
एकदम शांत और खामोश
शरारतो को उसने
जैसे कही बांध कर रख दिया था
आखिर माँ ने निशी से पूछा
उदास क्यों हो
बेटा क्या हो गया?
सब्र का बाँध टूटा
और निशी ने धीरे से कुछ कहा
जो कोई सुन ही ना सका
और फिर आँखो से समुंद्र बहा
उसे चुप करा कर पूछा गया
तो उसने कहा
कल स्कूल मे PTM है
आप दोनो चलोगे ना?
सुनकर माँ पापा ने
एक दूसरे को देखा
पर दादी और निशी से
नजरे ना मिला सके

माँ पापा ने वक्त को पीछे किया
और अपनी लापरवाहियो को गिना
फिर बडी हिम्मत से निशी को देखा
और कहा
हाँ! हाँ! हम चलेंगे ना बेटा
बस सुनने की देर थी
कि निशी चहक उठी
और दादी ने कहाँ
ये लाइट पहले क्यूँ नही गयी।
~Anupama

क्या कूद जाना जरूरी था..??

हाँ! हाँ जरूरी था अब्बा
उस दिन, उस वक्त
मै जिस सोच के साथ खडी थी
जैसे आपकी नसीहत मेरे सामने पडी थी
मै फेल नही हुई थी अब्बा
बस आप का भरोसा 2% से टूटा था
क्यूँ आपने ये नही सोचा
2% मेरे ख्वाबो का भी कोटा हो सकता था

मेरी साथ जाती मेरी दोस्त के अब्बा ने आपको बताया
मेरी दोस्त ने प्रथम स्थान पाया था
एकदम खामोश रहे आप
क्या उन 2% का होना इतना ज्यादा जरूरी था

हाँ! मै और मेरी दोस्त
हम एक ही स्कूल मे पढते थे
साथ ही स्कूल जाते थे,
हम साथ खेलते थे,
हंसते थे,
रोते थे,
पढते थे,
लडते थे,
झगडते थे। लेकिन फिर भी हम अलग थे अब्बा!
हम क्या! पूरी दुनिया मे हर इंसान
अपनी पसंद, नापसंद, सोच, विचार, आदत, व्यवहार सब मे एक दूसरे से अलग है

अब देखो ना अब्बा
मुझे बहुत बुरा लगा था
आपको मुझपर थोडा भी गर्व नही था
मैने 60 से 88% तक का सफर तय किया था
सिर्फ आपके लिए
क्योकि मुझे तो पढने से ज्यादा सिंगिग और डांस पसंद था
लेकिन शायद आपके लिए वो भी कम था
पर एक बार कहते तो सही मुझसे
मै फिर से जी जान से कोशिश करती

लेकिन उस वक्त जब आपने मुझे डांटा
चलो माना आपका हक था
पर क्या 60 से 88% तक का सफर 2% के आगे अपनी पहचान खो चुका था

मैने कब आपके ख्वाब को
पूरा ना करने का ऐसा कुछ कहा था
आपका मानना था
आपके ख्वाब पूरे करना मेरा फर्ज था
अब्बा कभी कहा नही मैने
पर एक ख्वाब मेरा भी यही था

पर मै कूद गयी अब्बा(जान दे दी मैने)
कुछ मुझे मेरे ही खो जाने का डर था
तो कुछ तेरे मायूस चेहरे का
कारण “मै ही हूँ” बहोत सता रहा था

हाँ! मै आपकी नालायक औलाद हूँ
पर आप भी समझो ना
इंसान भी तो हूँ
अलग हूँ
फिर भी कोशिशे कर रही थी, आपके ख्वाब पूरे करने की
लेकिन फिर चीखे मेरे ख्वाबो की मुझसे सुनी ही नही गयी। ये खत जवाब है अब्बा
जो शायद आप मुझे खोने के बाद मुझसे पूछना चाहोगे
क्या कूद जाना जरूरी था..??….आलिया?
~Anupama

कान्हा तुम ह्रदय स्पन्दन

हर क्षण,
हर कण,
जन जन का स्वर
बोले अभिनन्दन! अभिनन्दन!
जन्म तेरा मंगल मंगल
कान्हा तुम मन का वन्दन
कान्हा तुम ह्रदय स्पन्दन

मोहित करे मुरली की तान
नटखट अलबेली तेरी चाल
सांवला रंग, माथे मोर पंख
तुम पर रूके गोपियो के नयन
कान्हा तुम मन का वन्दन
कान्हा तुम ह्रदय स्पन्दन

प्रेम का वायु मे मिश्रण
तेरी लीलाओ के अदभुत रंग
मीरा का तुझमे ही तन मन
राधा तेरी प्रियसी प्रीतम
कान्हा तुम मन का वन्दन
कान्हा तुम ह्रदय स्पन्दन

जग पर तेरी कृपा अपार
दूर करे भ्रम का अंधकार
कण कण मे तुम प्राण समान
मोह माया का हो समाधान
कान्हा तुम मन का वन्दन
कान्हा तुम ह्रदय स्पन्दन
~Anupama

मनचाही पांव की जमीं

कदम रूके नही मेरे
थके नही है हौसले
मनचाही पांव की जमीं
हम ढूढँने निकल पडे

सौ बार राह से भटके थे
‘सोचा लौट चले’
ऐसे भी अटके थे
पर बीच समंदर आ कर के
लौट जाना है नादानी रे
उम्मीदे फुसफुसायी इसे पार कर ले
कुछ यूँ गिरते हौसले उसने संभाले थे
मनचाही पांव की जमीं
हम भी पाने को बेताब थे

तेरी जमीं नही इस जहान मे
सबके यही विचार थे
क्यूँ ये जहां रास नही तुझे
तू उडने चला आसमान मे
फिर मै और मेरा साया मुस्कुराए थे
कुछ यूँ हमने
आशाओ के तार निराशाओ पर गिराए थे
मनचाही पांव की जमीं
हम भी पाने को बेताब थे

तूफां के सिलसिले है जोर पे
सब नाजुक तिनके सा मुझे कहे
उडा के कहाँ ले जाऐंगे
तू अभी सोच भी ये ना सके
मैने लम्बी सांस भरकर कहा
मुझे डर नही है तूफां से
उम्मीद है उडे तो
सही जगह ही जा गिरे
और मनचाही पांव की जमीं
हम ढूढँने निकल पडे
~Anupama

एक कप चाय

सर्दी कडक पड रही थी
गाडी रेड लाईट पर रूकी थी
शीशे पर इक दस्तक सी हुई
ड्राइवर ने खिडकी खोल दी
“एक कप चाय के पैसे दे दो”
एक बूढे की आवाज थी
तन पर फटे से कपडे थे
उसके शब्द भी तुतलाए थे
हाथ पांव पूरे काँप रहे थे
उम्मीद लिए मुश्किल से खडे थे
मै कुछ पूछनेे को आगे बढी
पर ड्राइवर ने खिडकी बंद की और गाडी चला दी

हम उन्हे अनदेखा कर आगे निकल आए थे

मैने ड्राइवर अंकल से पूछा
आपने पैसे क्यू नही दिए
उन्होने कहा
बाबा इनका रोज का काम है
आप ध्यान मत दीजिए

मै बच्ची थी, तो बच्चो वाली ही हरकत की
जो मना किया उसी पर अड गयी

एक प्रश्न फिर से पूछ लिया
क्या बूढा बाबा कल फिर आएगा
ड्राइवर अंकल बोले
हाँ बाबा ये रोज यही करते है

अगले द़िन
फिर से रेड लाइट पर गाडी रूकी
पर कोई भी दस्तक ना हुई
ड्राइवर ने खुद ही खिडकी खोल दी
सडक के किनारे कुछ भीड जमा थी
भीट मे से वापस आते शख्स से ड्राइवर अंकल ने वजह पूछी
” कोई बूढा भिखारी मर गया ”
वो शख्स कहकर चला गया

मै सुनकर चौक गयी
मेरी मुट्ठी जो अबतक बंद थी
कुछ ढीली पड गयी
कैद करके लायी थी जो
चाय के लिए सिक्के
मुट्ठी मे से फिसले रेत जैसे
ऐसे निकल कर गिर गये

~अनुपमा_ वर्मा

माँ

जब हमे बोलना नही आता था, तो भी तू समझ जाती थी
आज तू बोलती है तो हम कहते है “समझ नही आती”

सौ सौ बार बोलकर, तूने बोलना सिखाया
आज तुझे दूसरी बार भी जवाब देना, हमे रास ना आया

पूरे घर मे खाना लेकर, पीछे पीछे घूमा करती थी
हमने तो जाने कब आखिरी बार पूछा था “माँ तूने खाना खाया या नही”

हमारी शरारतो पर तू, कभी नही चिल्लाती थी
हम चिल्ला देते है अकसर गर जो तूझसे चाय भी फैल गयी

हमे नींद नही आती थी तो, तू लोरी गाकर सुलाती थी
और हमे तो पता ही नही, तू रात रो रो कर बीताती रही

हमारी नींद ना टूटे, तू कान्हा जी की आरती भी धीमी आवाज मे गाती थी
पर हमारे लिए तो पार्टी की शान, गाने की ऊँची आवाज जरूरी थी

हमारी चोट का मरहम बनकर, तू हमेशा हाजिर रहती थी
हमारे पास तो तेरी चोट, पूछने का ही वक्त नही

मेरा हाथ पकडकर माँ, तूने ही तो लिखना सिखाया था
तुझसे थपकी पाने की चाह ने ही तो, मुझे इतना सफल बनाया माँ

गोद मे लेकर जहाँ दिखाने वाली, माँ के घुटनो मे अब दर्द है
एक बार तो पास बैठकर कहो ,माँ हम तेरे संग है

हम जवान हो गए है और माँ मासूम बच्चे सी हो गयी है
पर मैने देखा है उसकी दुआए, अब भी उतना ही असर करती है
~Anupama verma

क्यूँ और काश

एक दिन तुम
तुमसे थक जाओगे
सामने दो गली होंगी
बताओ!
फिर किस गली जाना चाहोगे?

पहली गली
पहली गली तुम्हे
यादो के शहर ले जाएगी
और दूसरी गली
दूसरी गली भी तुम्हे
यादो के शहर ले जाएगी
लेकिन
फिर भी दोनो अलग है
क्योकि
पहली गली मे जाकर
तुम कुछ पुराने जालिम
लम्हो से मिलोगे
और फिर उनमे आज का भी
ये जालिम लम्हा जोडकर
कहोगे
“हमेशा मेरे साथ ही ऐसा क्यूँ होता है”
“हमेशा मै ही क्यूँ”
क्यूँ… क्यूँ… क्यूँ..
और ना जाने ऐसे कितने क्यूँ
तुम्हारे सामने होंगे।
मैथ्स की वो थ्योरीज याद है क्या
जो कभी काम नही आती
लेकिन फिर भी हम उन्हे पढते थे
जानते हो क्यो?
क्योकि
वो हमारे सिलेबस मे थी ना
कुछ ऐसी ही ये पहली गली है

दूसरी गली
दूसरी गली भी तुम्हे
यादो के शहर ले जाएगी
इस गली मे जाकर
तुम कुछ पुराने अच्छे
लम्हो से मिलोगे
और फिर उनकी
आज के लम्हो के साथ,
शायद बेबुनियाद
उनकी तुलना करोगे
और कहोगे
“वो भी क्या दिन थे”
“काश वो दिन लौट आए”
“काश आज भी सब वैसा ही होता”
काश.. काश… काश…
और ना जाने ऐसे कितने काश
तुम्हारे सामने होंगे।
मैथ्स का पेपर याद है क्या
जब तुम्हारे बगल मे तुमसे
पीछे वाली क्लास का बच्चा बैठा होता था
और हम उसके पेपर मे झांककर
वो जाने पहचाने से सवाल देखकर
जो हमे आते थे कभी
लेकिन अब नही
उन्हे याद करने की नाकाम कोशिश करते है
कुछ ऐसी ही ये दूसरी गली है

मेरा ख्याल है
पहली गली “क्यूँ” मे
जो इंसान अटके है
“काश” के आंगन मे वो
पनाह लेकर भी भटके है

सुनो
मुझे सुकून है
इस बात पर यकीन है
तुम इन गलियो मे नही होंगे
क्योकि
महोब्बत तो तुम्हे थी ही नही
हम गलत समझे
मान गए खता हमारी थी
और तुम हमेशा थे सही
~Anupama verma