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आमीन

बेशक मुख्तलिफ हो चली अब सारी रिवायत है
कि अब हर किसी को यहाँ बस शिकायत ही शिकायत है
वाबस्ता हर किसी से सहारे कैफियत के है
मुखालिफ भी साथ चलता बनकर पासबां है
पर जिस तरह मुख्तसर सा मेरा ख्वाब बन चुका परवाज है
उसी तरह मेरा तझसे पुराना एतीराफ बरकरार है
कि तेरी दीद मेरी आज भी ईद है
तू ही सहर और तू ही मेरे रोजे का इफ्तार है
बेशक बदल गयी ये सारी कायनात है
पर मेरी जुबां पर तेरा नाम आज भी आमीन है

बेशक मुनाफिक हो चली अब तेरी, मेरी, हम सबकी मुस्कान है
कि खुशरंग हयात भी पढ रही अब संजीदा सा पाठ है
तलाश किया बहोत पर अब नवाजिश भी नही मयस्सर है
आवाम भूल रहा यहा लहजे का सारा लिहाज है
पर जिस तरह मौतजा हो चला मेरा हर अल्फाज है
उसी तरह मेरा तझसे पुराना एतीराफ बरकरार है
कि तेरी दीद मेरी आज भी ईद है
तू ही सहर और तू ही मेरे रोजे का इफ्तार है
बेशक बदल गयी ये सारी कायनात है
पर मेरी जुबां पर तेरा नाम आज भी आमीन है

रफ्तार मे अपनी खोते जा रहे रूहानियत है
कि जुस्तजू को ही समझ रहे वो खुदा की इनायत है
सुकून मिला नही कही और अब मन भी इज्तिरार है
हर सहर लगे ऐसे जैसे निकला ही नही आफताब है
पर जिस तरह आफरीन ये पूर्णिमा का चाँद है
उसी तरह मेरा तझसे पुराना एतीराफ बरकरार है
कि तेरी दीद मेरी आज भी ईद है
तू ही सहर और तू ही मेरे रोजे का इफ्तार है
बेशक बदल गयी ये सारी कायनात है
पर मेरी जुबां पर तेरा नाम आज भी आमीन है
#Anupama 2/06/201810:59pm

मुझे फिर से तारे गिनना है

थक गयी हूँ दौड कर
अब मुझे थोडा रूकना है
क्या मंजिल मंजिल लगा रखा है यार
सच पूछो मुझे कही नही पहुंचना है
बस छत पर लेट कर पापा के साथ
मुझे फिर से तारे गिनना है

बदल गयी मेरी सोच को
एक बार फिर से बदलना है
वैसे तो दो मिनट मे मैगी बन जाती है
पर मुझे अब पुराना स्वाद चखना है
पापा के साथ बैठकर उनकी थाली मे से
वो रोटी का बीच वाला टुकडा खाना है

ख्वाहिश थी बडा होना और मनचाहा करना
जहाँ चाहो वहा घूमना, मौज मस्ती करना
पर कहा चली किसी की, जिंदगी ने अपने हिसाब से घुमाया है
इसलिए अब थोडा वापस पीछे जाना है
पापा के स्कूटर पर आगे खडे होकर
मुझे एक बार फिर से मेले मे जाना है

देर ना हो जाए
कही लेपटाप या कपडे भीग ना जाए
बेफिजूल इन सवालो मे अब और नही उलझना है
बारिश बडी नही होती जनाब
इसलिए मुझे भी बडा नही बनना है
पापा के साथ बारिश के पानी मे नाव दौडाने का
मुझे एक बार फिर से काम्पिटीशन करना है

नयेपन के लिए क्या क्या नही करते है
हर दिन आइने मे नया हेयर स्टाइल दिखता है
पर आज कुछ तस्वीरे देखी पुरानी
तो देखा वो चेहरा कितना प्यारा लगता है
पापा जो दाएं बाएं गर्दन घुमाकर, तेल लगाकर, बाल बनाया करते थे
मुझे वही हेयर स्टाइल फिर से करना है

क्या मंजिल मंजिल लगा रखा है यार
सच पूछो मुझे कही नही पहुंचना है
बस छत पर लेट कर पापा के साथ
मुझे फिर से तारे गिनना है
~Anupama verma

मै सब्र हूँ बेसब्र सी

मै सब्र हूँ
बेसब्र सी
मै हूँ आसमां
अनंत सी
मै परछायी मेरी
घबरायी सी
मै स्वच्छंद हूँ
उडती रेत सी
मै इश्क हूँ
बहते अश्क सी
मै हूँ रकीब
मिलते सबक सी
मै कविता हूँ
आबाद सी
मै हूँ कथा
बरबाद सी
मै धरा हूँ
बलवान सी
मै हूँ मुकुल
विराग सी
मै दरिद्र हूँ
तिरस्कृत सी
मै हूँ अमीर
ज़मीर सी
मै सूर्य हूँ
तीव्र किरणो सी
मै छांव हूँ
विचार विरले सी
मै तेज हूँ
बहते नीर सी
मै हूँ सरल
मेरी प्रीत सी
मै मस्तिष्क हूँ
कुछ स्वार्थी सी
मै हूँ हृदय
अतुल्य नेक सी
#Anupama _verma

कान्हा

अरण्य रोदन समय व्यतीत
ना कर बावरे धरले धीर
पथ हो तेरा स्वार्थहीन
प्रकट होगा वो बन पथिक

आरसी समान हो तेरी मीत
रह कान्हा भक्ति मे लीन
गर हो विपदा प्रतीत समीप
हौंसले रखना उर से सींच
पथ हो तेरा स्वार्थहीन
प्रकट होगा वो बन पथिक

घाव देना ना हो तेरी जीत
मरहम रखना जुबां पर सील
भविष्य हो या हो अतीत
सब होंगे तेरे अधीन
पथ हो तेरा स्वार्थहीन
प्रकट होगा वो बन पथिक

सदाचार रीतो की रीत
तुझसे भी यही उम्मीद
पुष्प ना हो सौरभ विहीन
सुनकर तेरी तीखी वाणीपथ हो तेरा स्वार्थहीन
प्रकट होगा वो बन पथिक
~Anupama verma

हर पायल रोनक नही होती

सिर्फ मै ही नही
मेरा पूरा घर खुश था
और वो दूसरा घर भी
जिससे नाता जुडने वाला था
पहली मुलाकात तो उससे
घर वालो ने ही करवायी थी
पर शादी से पहले
वो दूसरी बार
जब हम चोरी चोरी मिले थे
तो मुझसे एक खता हो गयी थी

उसने पायल दी थी तोहफे मे
बिल्कुल वैसे घुंघरू वाली
जैसे बाबा ने पहनायी थी बचपन मे
उस दिन लगा था मुझे
वो बिल्कुल बाबा जैसे है
इस पायल का मतलब भी
घर की रोनक ही है
शादी हो गयी
बाबा की दी पायल वही रह गयी
उस घर के लिए मै परायी हो गयी
मै नयी पायल पहनकर
नए घर मे आ गयी

मुझे लगा था
नए घर को मैने कुछ
शादी से पहले जान लिया था
लेकिन मै गलत थी
वहाँ सब अनजाना था
उन्होने आगे पढने नही दिया
दुप्पटा सिर से सरकने नही दिया
रीती रिवाज तो सब निभाए
पर मुझे कभी खिलखिलाकर हंसने नही दिया
फिर एक दिन
जब उसी शख्स ने
जिसने पायल दी थी मुझे
मुझपर हाथ उठाकर
अपनी मर्दानगी साबित की थी
तो मुझे मेरी खता मालूम हुई थी
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हर पायल रोनक नही होती
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हाँ! हर पायल रोनक नही होती
बस बाबा की पहनायी
उस पायल का मतलब रोनक था
उस दिन उस तोहफे मे मिली
पायल का मतलब तो “बेडियो” से था

कीमती तो वो पहले भी थी
पर अब कीमत समझ आयी थी
आज बाबा की दी पायल बहोत याद आई थी
~Anupama_verma

गुल्लक

वो छोटी सी जमीं
हम सबका आसमां थी
जब बिजली जाती, सब साथ बैठते थे
घर मे एक ही लालटेन थी
नयी नयी कहानियो की
कोई ऐसी खास फरमाईश नही होती
जब दादी गोद मे लेकर सुनाती
और हम उसे कई बार सुन लिया करते थे
वो एक ही कहानी होती थी

वो महीने की पहली तारीख
किसी जश्न से कम नही होती थी
जब घर आते थे पापा
तो एक हाथ मे राशन का सामान
और दूसरे हाथ मे समोसे और जलेबी की थैली होती थी
लेकिन उनको कोई भी बिमारी होती
तो डाॅक्टर की फीस को सोचकर
वो घर के नुस्खे से ही ठीक हो जाती थी
वो छोटी सी जमीं
हम सबका आसमां थी

हम सुबह फरमाईशे शुरू करते
और माँ रात तक पूरी करती रहती थी
पर ऐसा नही था कि
नींद, सुकून और आराम
वो पसंद ही नही करती थी
बस अपनी ख्वाहिशो को
वो हमसे जोड देती थी
एक और बात याद है
वो अकसर हमे मारकर
हमारे साथ खुद भी रोती थी
वो छोटी सी जमीं
हम सबका आसमां थी

वो दरवाजे के दाएँ तरफ
जो दादाजी का कमरा था
वहाँ एक चारपाई, हुक्का
और पानी का मटका होता था
बाकी तो फिर वो अपना
लुक्का छिपी का अड्डा था
ऐसा नही है कि हमने
चखा ही नही है हुक्के को
पर इतनी खासी भी नही आती थी
जितनी हम दिखाते थे
कि उसे पीने पर हमको आती थी
जो भी चिल्म उन्हे लाकर देते
उनकी ही पहले पीने की बारी होती थी
वो छोटी सी जमीं
हम सबका आसमां थी

हर दफा जिंदगी वफा नही करती
ये जिंदगी है, माँ नही
जमीं नीलामी पर आ गई थी
ये अपनो की ही थी धोखेबाजी
तब माँ ने गहने बेचे थे
बापू ने अपने बापू की
दी हुई स्कूटर बेची थी
पर रब पिघल गया था उस वक्त
जब हाथ मे सिक्के लेकर छोटा भाई आया
और अंदर उसकी माटी की गुल्लक
टुकडो टुकडो मे बिखरी देखी थी
वो छोटी सी जमीं
हम सब का आसमां थी
~Anupama