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मै सब्र हूँ बेसब्र सी

मै सब्र हूँ
बेसब्र सी
मै हूँ आसमां
अनंत सी
मै परछायी मेरी
घबरायी सी
मै स्वच्छंद हूँ
उडती रेत सी
मै इश्क हूँ
बहते अश्क सी
मै हूँ रकीब
मिलते सबक सी
मै कविता हूँ
आबाद सी
मै हूँ कथा
बरबाद सी
मै धरा हूँ
बलवान सी
मै हूँ मुकुल
विराग सी
मै दरिद्र हूँ
तिरस्कृत सी
मै हूँ अमीर
ज़मीर सी
मै सूर्य हूँ
तीव्र किरणो सी
मै छांव हूँ
विचार विरले सी
मै तेज हूँ
बहते नीर सी
मै हूँ सरल
मेरी प्रीत सी
मै मस्तिष्क हूँ
कुछ स्वार्थी सी
मै हूँ हृदय
अतुल्य नेक सी
#Anupama _verma

कान्हा

अरण्य रोदन समय व्यतीत
ना कर बावरे धरले धीर
पथ हो तेरा स्वार्थहीन
प्रकट होगा वो बन पथिक

आरसी समान हो तेरी मीत
रह कान्हा भक्ति मे लीन
गर हो विपदा प्रतीत समीप
हौंसले रखना उर से सींच
पथ हो तेरा स्वार्थहीन
प्रकट होगा वो बन पथिक

घाव देना ना हो तेरी जीत
मरहम रखना जुबां पर सील
भविष्य हो या हो अतीत
सब होंगे तेरे अधीन
पथ हो तेरा स्वार्थहीन
प्रकट होगा वो बन पथिक

सदाचार रीतो की रीत
तुझसे भी यही उम्मीद
पुष्प ना हो सौरभ विहीन
सुनकर तेरी तीखी वाणीपथ हो तेरा स्वार्थहीन
प्रकट होगा वो बन पथिक
~Anupama verma

हर पायल रोनक नही होती

सिर्फ मै ही नही
मेरा पूरा घर खुश था
और वो दूसरा घर भी
जिससे नाता जुडने वाला था
पहली मुलाकात तो उससे
घर वालो ने ही करवायी थी
पर शादी से पहले
वो दूसरी बार
जब हम चोरी चोरी मिले थे
तो मुझसे एक खता हो गयी थी

उसने पायल दी थी तोहफे मे
बिल्कुल वैसे घुंघरू वाली
जैसे बाबा ने पहनायी थी बचपन मे
उस दिन लगा था मुझे
वो बिल्कुल बाबा जैसे है
इस पायल का मतलब भी
घर की रोनक ही है
शादी हो गयी
बाबा की दी पायल वही रह गयी
उस घर के लिए मै परायी हो गयी
मै नयी पायल पहनकर
नए घर मे आ गयी

मुझे लगा था
नए घर को मैने कुछ
शादी से पहले जान लिया था
लेकिन मै गलत थी
वहाँ सब अनजाना था
उन्होने आगे पढने नही दिया
दुप्पटा सिर से सरकने नही दिया
रीती रिवाज तो सब निभाए
पर मुझे कभी खिलखिलाकर हंसने नही दिया
फिर एक दिन
जब उसी शख्स ने
जिसने पायल दी थी मुझे
मुझपर हाथ उठाकर
अपनी मर्दानगी साबित की थी
तो मुझे मेरी खता मालूम हुई थी
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हर पायल रोनक नही होती
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हाँ! हर पायल रोनक नही होती
बस बाबा की पहनायी
उस पायल का मतलब रोनक था
उस दिन उस तोहफे मे मिली
पायल का मतलब तो “बेडियो” से था

कीमती तो वो पहले भी थी
पर अब कीमत समझ आयी थी
आज बाबा की दी पायल बहोत याद आई थी
~Anupama_verma

गुल्लक

वो छोटी सी जमीं
हम सबका आसमां थी
जब बिजली जाती, सब साथ बैठते थे
घर मे एक ही लालटेन थी
नयी नयी कहानियो की
कोई ऐसी खास फरमाईश नही होती
जब दादी गोद मे लेकर सुनाती
और हम उसे कई बार सुन लिया करते थे
वो एक ही कहानी होती थी

वो महीने की पहली तारीख
किसी जश्न से कम नही होती थी
जब घर आते थे पापा
तो एक हाथ मे राशन का सामान
और दूसरे हाथ मे समोसे और जलेबी की थैली होती थी
लेकिन उनको कोई भी बिमारी होती
तो डाॅक्टर की फीस को सोचकर
वो घर के नुस्खे से ही ठीक हो जाती थी
वो छोटी सी जमीं
हम सबका आसमां थी

हम सुबह फरमाईशे शुरू करते
और माँ रात तक पूरी करती रहती थी
पर ऐसा नही था कि
नींद, सुकून और आराम
वो पसंद ही नही करती थी
बस अपनी ख्वाहिशो को
वो हमसे जोड देती थी
एक और बात याद है
वो अकसर हमे मारकर
हमारे साथ खुद भी रोती थी
वो छोटी सी जमीं
हम सबका आसमां थी

वो दरवाजे के दाएँ तरफ
जो दादाजी का कमरा था
वहाँ एक चारपाई, हुक्का
और पानी का मटका होता था
बाकी तो फिर वो अपना
लुक्का छिपी का अड्डा था
ऐसा नही है कि हमने
चखा ही नही है हुक्के को
पर इतनी खासी भी नही आती थी
जितनी हम दिखाते थे
कि उसे पीने पर हमको आती थी
जो भी चिल्म उन्हे लाकर देते
उनकी ही पहले पीने की बारी होती थी
वो छोटी सी जमीं
हम सबका आसमां थी

हर दफा जिंदगी वफा नही करती
ये जिंदगी है, माँ नही
जमीं नीलामी पर आ गई थी
ये अपनो की ही थी धोखेबाजी
तब माँ ने गहने बेचे थे
बापू ने अपने बापू की
दी हुई स्कूटर बेची थी
पर रब पिघल गया था उस वक्त
जब हाथ मे सिक्के लेकर छोटा भाई आया
और अंदर उसकी माटी की गुल्लक
टुकडो टुकडो मे बिखरी देखी थी
वो छोटी सी जमीं
हम सब का आसमां थी
~Anupama

इतना मुश्किल भी नही है

बहोत आसान है
जो हम अकसर करते है
लेकिन
मैने करके देखा है
हाँ.. वो जो हम अकसर नही करते है
और यकीं करो दोस्तो
इतना मुश्किल भी नहीं है

हाँ.. बहोत आसान है
बाहर से थककर घर आना
आते ही माँ के सामने फरमाईशो का बैग खोल देना
कुछ इस अंदाज मे
कि जैसे माँ ने पूरा दिन आराम ही किया होगा
लेकिन
मैने करके देखा है
हाँ.. वो जो हम अकसर नही करते है
बाहर से आकर थकान को अनदेखा कर
अपने और माँ के लिए कडक चाय बना लेना
और फिर साथ बैठकर चुस्की लेते हुए
पूरे दिन का हाल सुना देना
यकीं करो दोस्तो
इतना मुश्किल भी नही है

हाँ.. बहोत आसान है
हर महीने की पहली तारीख को
कभी साइकिल तो कभी विडीयो गेम के लिए
बाबा से बजट बनवा लेना
और बाबा का हमारा उदास चेहरा देखकर
“ना कहने के विचार”को कही दूर फेंक देना
लेकिन
मैने करके देखा है
हाँ.. वो जो हम अकसर नही करते है
हाँ.. मैने बाबा से पूछा है
क्या आपके बाबा भी हर बार बजट बना दिया करते थे
या बाकी है कोई ख्वाब
जो आप अपने लिए देखा करते थे
यकीं करो दोस्तो
इतना मुश्किल भी नही है

हाँ.. बहोत आसान है
किसी दोस्त की गलती पर
उससे नाराज होकर बोलना बंद कर देना
कुछ दूसरो दोस्तो के साथ बैठकर
बस यूँ ही उसे नजरअंदाज कर देना
लेकिन
मैने करके देखा है
हाँ.. वो जो हम अकसर नही करते है
दोस्त की गलती को नदी मे बहाकर
किनारे पर ही उससे पहले जैसे मिल लेना
और उसके साथ फिर से ऐसे जीना
कि गलतियो के लिए बचे ही ना कोई नौका
यकीं करो दोस्तो
इतना मुश्किल भी नही है
~Anupama verma

तुम्हारा पलटकर देखना भी जरूरी था

कालेज का पहला दिन था
हर चेहरा खिला खिला था
वो लडका किसी को जानता नही था
बस इसीलिए गुमसुम था
अनेक हलचलो के बीच जब उसने
एक खामोश लडकी को देखा
लगा था उसकी तन्हा खामोशी को
खुबसूरत खामोशी का साथ मिला था
आज भी याद है उसे
कितना खास था वो दिन
जब इत्तेफाक से पहली बार
वो किसी खास से मिला था

अरे कौन सी ड्रेस पहनूँ?
आज पहली दफा उलझा था
सिर्फ हेलो कहने की रिहर्सल भी
सुबह से 25 दफा कर चुका था
हर काम ठीक करने की कोशिश
बस आज ही कर रहा था
इत्तेफाक से मिली लडकी के साथ
पहली डेट थी इसलिए नर्वस हो रहा था
इंतजार को खूबसूरत
वो महसूस कर रहा था
क्या सोचेगी वो गर देर से पहुचा
इसलिए 30 मिनट पहले पहुंच गया था

सब ठीक ही रहा
बस उससे काफी गिर गयी थी
पर उसे बुरा नही लगा
जब उसे सहज करने को
वो लडकी हंस दी थी
लडकी को तब तक देखता रहा,जाते हुए भी
जब तक आँखो से ओझल ना हो गयी थी

फिर आम हो गयी मुलाकाते
चाँद तारो के वादे
कभी काम की बाते
तो कभी हंसने को जरूरी
बेकार की बाते
साथ रहने को ढूंढे बहाने
पर किसी को भी तो
रास ना आए, उनके ये नजराने
बेवकूफी से शुरू करके
बेशर्मी तक के दिए ताने
हालात ऐसे हुए कि वो हिचकिचाने लगे
अनजाने भी एक दूसरे के मिल जाने से

फिर आखिरी दिन कालेज का आया
सबको लगा
साथ मे ये इनका भी आखिरी दिन होगा
पर कौन समझाए इन्हे
दो लोगो का साथ ना दिखना
रूह अलग हो जाने का सबूत नही होता

लडका सोच रहा था
आखिरी बार मिलना क्यूँ जरूरी होता होगा
आज लडका वहीं खडा था
जहाँ लडकी से पहली दफा मिला था
खामोशी मे कही उसने कुछ बाते
वो खामोशी से समझ गया
फिर लडकी जाने के लिए मुडी
और लडका उसे देखता रहा
कि अचानक उसके सामने
हर वो लम्हा छा गया
जब वो हर मुलाकात के बाद
उसके ओझल हो जाने तक
उसे देखते रहा करता था
और उसे लगा
इस आखिरी मुलाकात मे
मेरा तुम्हे देखते रहना काफी नही
तुम्हारा पलटकर देखना भी जरूरी था
और उसने पलटकर देखा था

पर एक बात मे मै
अब तक उलझा था
जब साथ एक दूसरे का
दोनो को ही पसंद था
तो क्या था जो उन्हे अलग कर रहा था
मुद्दतो बाद आज पता चला
लडकी राजपूत और लडका सिद्दीकी था
~Anupama

वो छह साल की बच्ची थी यार

बहोत मुश्किल था
पर मन बना लिया था
अब नही लिखूंगी।
लेकिन कल शाम जब मैने
गांव मे कदम रखा
तो
देखा..

गांव की सारी औरते मिलकर
एक औरत को बुरी तरह मार रही थी
दूसरी तरफ गांव के सब आदमियो ने
उस औरत के पति को मार मार कर
अधमरा कर दिया था
मै जानती हूँ उस औरत को
वो हमारी ही तरह है बुरी नही है
फिर उसे क्यूँ मारा जा रहा है
क्या किया है उन्होने

जब कुछ अनचाहा होता है ना
तो हम चीखते है, चिल्लाते है
लेकिन जब उससे भी ज्यादा कुछ हो
तो खामोशी सबसे बडी हो जाती है
कि सारे अल्फाज, सारी बाते
चीखना, चिल्लाना सब का सब
मामूली और बेअसर लगने लगता है
और उसे इस हालत मे देखकर
मै खामोश हो गई थी
जैसे गले मे आवाज कभी थी ही नही
उस औरत को सब औरते मार रही थी
लेकिन एक औरत सिर्फ रो रही थी
बहोत, बहोत, बहोत बुरी तरह से
“मैने तुझे कहा था अपने बेटे को समझा ले”
रोते रोते वो औरत
बार बार बस यही दोहरा रही थी
और रो रही थी

इस पूरे झगडे के बीच
सबसे ज्यादा शोर वहाँ सन्नाटे का था
उस सन्नाटे मे मैने उस लडके को खोजा
वो नही था वहाँ
वो 11Th क्लास का लडका
एक छह साल की बच्ची को
अपनी हवस का शिकार बनाकर,
अपने माँ बाप को अपने किए की
सजा भुगतने के लिए छोडकर
भाग गया था

अब क्या
कुछ इंसाफ के लिए मोमबत्तियाँ जलाऐगे
कुछ जुवेनाइल कहकर उसकी सजा माफ कराएंगे
कुछ लोग हस्ताक्षर बरसाएंगे
और मुझे कोई हैरानी नही होगी
मै जानती हूँ
कि उन हस्ताक्षरो मे उस लडके के भी
हस्ताक्षर मिल जाएंगे

मुझे पता है
मेरे लिखने से भी
इंसाफ नही मिलेगा उसे
पर क्या है ना
पेट मे बात नही पचती
मै कल से खुद से यही दोहरा दोहरा कर थक गयी हूँ
और अगर मुझे वो लडका कही मिल जाए ना
मै उससे भी सिर्फ इतना कहना चाहती हूँ
“वो छह साल की बच्ची थी यार”
“सिर्फ छह साल”

काश समझ पाते तुम!
तो मै खुद का फैसला कभी वापस नही लेती
“कभी नही लिखती”
~Anupama